हर सख्श अपनी तनहाइ मे अपनी परछाइ को ढुंढता है,
चहेरो पर चढे चहेरो के पीछे की सच्चाइ को ढुंढता है,
खामोश निगाहोँ के पीछे छुपे ददँ को,
हँसते हुए होठोँ मे सीमटे हुए गम को,
दील मे सीसकीया लेती धडकन को,
साँसो मे लीपटे हर उस एक पल को,
बीन बताये सब जानले ऐसे कोइ हरजाई को ढुंढता है,
हर सख्श अपनी तनहाइ मे अपनी परछाइ को ढुंढता है,
बीन बताये सब जानले ऐसे कोइ हरजाई को ढुंढता है,
हर सख्श अपनी तनहाइ मे अपनी परछाइ को ढुंढता है,
“commendable” great