नयी दुल्हन के लीये….
तुम घुघंट मे गुमसुम बेठी हो, क्या सपने सजा रही हो सनम,
ये संसार नया है, प्यार नया, नयी दुनीया मे है पहेला कदम,
सपने सजाकर तुम लाइ हो,
थोडी थोडी गभराइ हो,
वो हल्का सा मुसकाइ हो,
छोड के संसार, अपने लोगो का प्यार , नीभाने आइ हो ये धरम,
तुम घुघंट मे गुमसुम बेठी हो, क्या सपने सजा रही हो सनम,
very vey beautiful poem
बहुत सुन्दर रचना लिखी है मनीष जी
बहुत-बहूत साधुवाद!
सुखदेव ‘करुण’ के ब्लोग में पधारने का सादर निमन्त्रण!